Hare Krishna Hare Krishna Krishna Krishna Hare Hare...
Hare Rama Hare Rama Rama Rama Hare Hare.........................
Hare Rama Hare Rama Rama Rama Hare Hare.........................
Sunday, July 1, 2012
Wednesday, June 27, 2012
कान्हा के नाम चिट्ठी - रखियो प्रीत की लाज- चंद्रानी पुरकायस्थ (पिंकी )
कान्हा रे , रखियो प्रीत की लाज ,
तन मन धन सब हारे तुम पर,
तोहरे दरस की आस .
रखियो प्रीत की लाज.
प्रीत अमृत बृक्ष रोपा ,
अँसुवन जल से नित-नित सींचा.
तन मन धन सब हारे तुम पर,
तोहरे दरस की आस .
रखियो प्रीत की लाज.
प्रीत अमृत बृक्ष रोपा ,
अँसुवन जल से नित-नित सींचा.
कलुष का तेज डराता जायें,
तोहरे छाव की प्यास .
रखियो प्रीत की लाज.
तू हैं काया ,में तेरी छाया;
रोम रोम में तू ही समाया.
पल- छिन अब तो युग सी लागे.
रखियो प्रीत की लाज.
तू हैं काया ,में तेरी छाया;
रोम रोम में तू ही समाया.
पल- छिन अब तो युग सी लागे.
मिलन को तड़पे प्राण.
रखियो प्रीत की लाज...........
Wednesday, May 23, 2012
अनमोल खजाना -मीरा भजन- बिना प्रभु कुण बांचे पाती
कुण बांचे पाती, बिना प्रभु कुण बांचे पाती।
कागद ले ऊधोजी आयो, कहां रह्या साथी।
आवत जावत पांव घिस्या रे (वाला) अंखिया भई राती॥
कागद ले राधा वांचण बैठी, (वाला) भर आई छाती।
नैण नीरज में अम्ब बहे रे (बाला) गंगा बहि जाती॥
पाना ज्यूं पीली पड़ी रे (वाला) धान नहीं खाती।
हरि बिन जिवणो यूं जलै रे (वाला) ज्यूं दीपक संग बाती॥
मने भरोसो रामको रे (वाला) डूब तिर्यो हाथी।
दासि मीरा लाल गिरधर, सांकडारो साथी॥
कागद ले ऊधोजी आयो, कहां रह्या साथी।
आवत जावत पांव घिस्या रे (वाला) अंखिया भई राती॥
कागद ले राधा वांचण बैठी, (वाला) भर आई छाती।
नैण नीरज में अम्ब बहे रे (बाला) गंगा बहि जाती॥
पाना ज्यूं पीली पड़ी रे (वाला) धान नहीं खाती।
हरि बिन जिवणो यूं जलै रे (वाला) ज्यूं दीपक संग बाती॥
मने भरोसो रामको रे (वाला) डूब तिर्यो हाथी।
दासि मीरा लाल गिरधर, सांकडारो साथी॥
शब्दार्थ :- कुण =कौन। पाती = चिट्ठी। साथी =सखा, श्रीकृष्ण से आशय है। घिस्या = घिस गये। राती = रोते-रोते लाल हो गई। अम्ब = पानी। म्हने =मुझे सांकडारो =संकट में अपने भक्तों का सहायक।
Wednesday, May 9, 2012
Monday, May 7, 2012
कान्हा के नाम चिठ्ठी - तेरा प्रेम -चंद्रानी पुरकायस्थ (पिंकी)
मैं अकेली थी , अकेली हूँ और सायद अकेली ही रहूंगी।
भीड़ में भी अकेली ।।
भीड़ में भी अकेली ।।
हर अपना, अपने होने का एहसास दिला कर खो जाता है.
मैं सुनी गलियारे में झांकती , सोचती कोई किसी का अपना होकर भी ,
अपना नही ???
तभी तू कानों में मेरे हलके से कह जाता ,
हर पल , हर कदम मैं साथ हूँ तेरे ।
मैं मोर पंख से छन छन आती किरणों में ,
ढूंढ़ लेती तुझे।
तू अपनी आँखों कि भाषा से
हर बात कह जाता ।
मैं अँधेरे से डर जाती ,
तू बाति लेकर राह दिखाता.
हाँ , पता हैं मुझे ,
हर पल तू साथ था, साथ है, साथ रहेगा।
प्रेम क्या है तुने ही तो सिखलाया ,
मैं संसार भर प्रेम ढूँढती रही।
तू बाति लेकर राह दिखाता.
हाँ , पता हैं मुझे ,
हर पल तू साथ था, साथ है, साथ रहेगा।
प्रेम क्या है तुने ही तो सिखलाया ,
मैं संसार भर प्रेम ढूँढती रही।
और तू प्रेम की धार बन ,
मन में ही बहता हुआ नजर आया।
Saturday, November 26, 2011
कान्हा के नाम चिट्ठी - प्रेम - चंद्रानी पुरकायस्थ (पिंकी )
राधे की सोच सोच तुझसे झगड़ते होंगे .
तुझे निठुर और पत्थर कहते होंगे ,
मथुरा के वैभबों में तू गोकुल को भूल गया ,
ये इल्जाम देते होंगे .
किसने सोचा दुनिया के आँसु पोछने के लिए ,
तुने अपनी आँखों में सारे मोती पिरो लिए .
कितनी बार मैया और बाबा के लिए मन अकुलाया तेरा,
किसने हिसाब रक्खा,
कितनी बार तेरी आँखें गोप सखाओं को धुंड-धुंड ब्याकुल हो उठी .
कितनी बार अपने गाय-बछड़ो को याद कर कर तू बिलख उठा ,
कितनी कितनी बार ब्रज के प्रान्तर,पहाड़, गलियाँ और युमना,
सपनों में आकर तुझे जगाते रहें.
एक ख़ामोशी के अलावा किसने देखा?
एक तेरी बाँसुरी के सिवा किसने महसूस किया ?
राधा को तू कब भुला , तू तो हर पल उसके साथ था ,
हा भौगोलिक दुरी थी , पर मन से कब तू जुदा रहा .
तेरी मुरली की हर एक तान तो राधा को ही पुकारती रही ,
रुक्मिणी सत्यभामा में भी तुने राधा का ही स्मरण किया .
हर दुःख को सहते हुए तुने हस हस हर कर्तब्य को निभाया .
हे योगेश्वर, तूने प्रेम का कुछ ऐसा योग लिया,
लोग तो प्रेम पर दुनिया लुटा देतें हैं ,
तुने तो दुनिया के प्रेम में अपने आप को ही लुटा डाला .
Tuesday, November 8, 2011
कान्हा के नाम चिट्ठी -तू तो जाने गति मेरे मन की
कान्हा रे, तू तो जाने गति मेरे मन की,
झूट के पीछे भागी फिरूं मैं ,
सच से मैं अनजानी .
तू तो जाने गति मेरे मन की,
झूट के पीछे भागी फिरूं मैं ,
सच से मैं अनजानी .
तू तो जाने गति मेरे मन की,
कौन राह तो से मिलाएँ,
कौन बढ़ाये दुरी .
मोड़ पर खड़ी तो को पुकारूँ,
राह दिखा अबिनाशी .
तू तो जाने गति मेरे मन की.
रुत आये रुत जाये ,
पर तेरी खबर न आये.
पल पल तो को पुकारे मनवा ,
दे अब दरश दिखाय.
सूरत तेरी जी भर निहारूं,
कुछ ऐसों कर दे मुरारी .
मैं मुरख अज्ञानी कान्हा ,
तू हैं अंतर्यामी .रंग तोरे रंग दे मोहे,
मन मोहन मनोहारी ,
तू तो जाने गति मेरे मन की.
मैं मुरख अज्ञानी कान्हा ,
तू हैं अंतर्यामी .रंग तोरे रंग दे मोहे,
मन मोहन मनोहारी ,
तू तो जाने गति मेरे मन की.
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