Hare Krishna Hare Krishna Krishna Krishna Hare Hare...
Hare Rama Hare Rama Rama Rama Hare Hare.........................

Thursday, June 13, 2013

अनमोल खजाना : लागी मोहिं नाम-खुमारी हो : मीराबाई


 
लागी मोहिं नाम-खुमारी हो॥
रिमझिम बरसै मेहड़ा भीजै तन सारी हो।
चहुंदिस दमकै दामणी गरजै घन भारी हो॥
सतगुर भेद बताया खोली भरम -किंवारी हो।
सब घट दीसै आतमा सबहीसूं न्यारी हो॥
दीपग जोऊं ग्यानका चढूं अगम अटारी हो।
मीरा दासी रामकी इमरत बलिहारी हो॥

शब्दार्थ :- खुमारी =थकावट, हल्का नशा। मेहड़ा =मेघ, आशय प्रेम की भावना से है। सारी =सारा अंग अथवा साड़ी। भरम-किंवारी =भ्रांतिरूपी किवाड़। दीपग =दीपक जोऊं=जलाती हूं। अटारी =ऊंचा स्थान, परमपद से आशय है। इमरत =अमृत।


Wednesday, March 27, 2013

कान्हा के नाम चिठ्ठी -पिंकी पुरकायस्थ चंद्रानी




अरे कान्हा, काहे तू मोको रुलाये ,
पल छिन मैंने तो पर छोड़ा ,
काहे न राह दिखाये .
मो को क्यों तरसाये .
सात जनम के धागे सारे ,
छूट छुट  गिरे मन घबराये,
तू जो साथ निभाये मेरा,
कोई का मोको रुलाये .
काहे ना राह दिखाये .
मै तो तेरी हूँ ओ मनमोहन,
तुझ पर मोरा जीवन अर्पण .
तो फिर क्यों भटकाये 
काहे तू मोको रुलाये ..........

Friday, October 5, 2012

अनमोल खजाना - मीराबाई - हरि बिन ना सरै री माई

 हरि बिन ना सरै री माई।
मेरा प्राण निकस्या जात, हरी बिन ना सरै माई।
मीन दादुर बसत जल में, जल से उपजाई॥
तनक जल से बाहर कीना तुरत मर जाई।
कान लकरी बन परी काठ धुन खाई।
ले अगन प्रभु डार आये भसम हो जाई॥
बन बन ढूंढत मैं फिरी माई सुधि नहिं पाई।
एक बेर दरसण दीजे सब कसर मिटि जाई॥
पात ज्यों पीली पड़ी अरु बिपत तन छाई।
दासि मीरा लाल गिरधर मिल्या सुख छाई

Friday, July 20, 2012

मिलन : कान्हा के नाम चिट्ठी: चंद्रानी (पिंकी )


कान्हा, मो से मिलन को आयों,
सावन पंचमी की रात .
मनोहर मूरत , सावली सूरत,
मिटा गयों  संताप . 
 हिव्ड़े से लिपट लिपट कर ,
बोल्या मीठी वाणी  .
छल छल  नीर बहें नैनन से,
रोक्या  डगर  म्हारी .
अबहू  दरद कोई  तन से न लाग्ये,
मिट गयों  भय अरु त्रास. 
चांदन से धुल रही रैना ,
बुझी नैनन की प्यास . 

श्यामरंग, रंग गयी मैं  तो ,
जग से मोहे क्या काज.
अब काहूँ का ध्यान  धरूँ,
जो मिल गयें महाराज .



अनमोल खजाना :किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत: सूरदासजी

 
 किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत ।
मनिमय कनक नंद कै आँगन, बिंब पकरिबैं धावत ॥

कबहुँ निरखि हरि आपु छाहँ कौं, कर सौं पकरन चाहत ।
किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ, पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत ॥
कनक-भूमि पद कर-पग-छाया, यह उपमा इक राजति ।
करि-करि प्रतिपद प्रति मनि बसुधा, कमल बैठकी साजति ॥
बाल-दसा-सुख निरखि जसोदा, पुनि-पुनि नंद बुलावति ।
अँचरा तर लै ढाँकि, सूर के प्रभु कौं दूध पियावति ॥

भावार्थ :-- कन्हाई किलकारी मारता घुटनों चलता आ रहा है । श्रीनन्द जी के मणिमय आँगन में वह अपना प्रतिबिम्ब पकड़ने दौड़ रहा है । श्याम कभी अपने प्रतिबिम्ब को देखकर उसे हाथ से पकड़ना चाहता है । किलकारी मारकर हँसते समय उसकी दोनों दँतुलियाँ बहुत शोभा देती हैं, वह बार-बार उसी(प्रतिबिम्ब) को पकड़ना चाहता है । स्वर्णभूमि पर हाथ और चरणों की छाया ऐसी पड़ती है कि यह एक उपमा (उसके लिये) शोभा देनेवाली है कि मानो पृथ्वी (मोहन के) प्रत्येक पद पर प्रत्येक मणि में कमल प्रकट करके उसके लिये (बैठने को) आसन सजाती है । बालविनोद के आनन्द को देखकर माता यशोदा बार-बार श्रीनन्द जी को वहाँ (वह आनन्द देखने के लिये)बुलाती हैं । सूरदास के स्वामी को (मैया) अञ्चल के नीचे लेकर ढक कर दूध पिलाती हैं ।

Saturday, July 7, 2012




कित गया मोरा गोपाल कृष्ण ,
ढूँढ रही माँ योशोदा .
कित गया मोरा नंदलाला,
पूँछ रही माँ यशोदा.
दही की मटकी, माखन की मटकी,
तोड़े फोड़े, ग्यालिनो की बस्ती .
माखन चुराने में जिसकी मस्ती .
वह चोर छुप गया कहाँ .
कित गया मोरा गोपाल कृष्ण ,
ढूँढ रही माँ योशोदा .
डोर से बाँधे, बंधन रहे ना,
डोर नही जैसे फुलों का गहना .
उस अबिनाशी को बांध सके ना,
जो ना वह स्वयम बंधने आये .
कित गया मोरा गोपाल कृष्ण ,
हाथ में ब्रह्माण्ड लड्डू ,
यमुना पायल भयी चरणों में .
सोचे मैया बालक भेश में ,
कौन जादूगर खेले हाय .
कित गया मोरा गोपाल कृष्ण ,
ढूँढ रही माँ योशोदा .
कित गया मोरा नंदलाला,
पूँछ रही माँ यशोदा.

Thursday, July 5, 2012

कान्हा के नाम चिठ्ठी: चंद्रानी (पिंकी)

कान्हा तुम्हारे नाम की चिट्टी लिखने पर ,मेरे मन को एक अजीब सी शांति मिलती हैं. तुम्हे पता हैं, दिन रात सोचती हूँ , तुम पर सब कुछ न्योछावर कर दू. जानती हूँ की  कहना आसान हैं, करना मुस्किल, पर तुम चाहो तो नामुमकिन भी मुमकिन हो जायें...प्रेम में बड़ी शक्ति होती हैं... आज उसी प्रेम की एक कहानी को , तकनिकी सहायता  थोड़ा सजाने-सवारने  की कौसिश करते  हुए , तुम्हारे चरणों में अर्पण करती हूँ..