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Sunday, June 26, 2011

meera

मीरा भजन : अनमोल खजाना 
( I )
गोबिन्द लीन्यो मोल, माई मैं गोबिन्द लीन्यो मोल
कोई कहै सस्तो कोई कहै महँगो लीन्यो तराजू तोल
कोई कहै घर में कोई कहै वन में, राधा के संग किलोल
मीरा के प्रभु गिरधर नागर आवत प्रेम के मोल  
( II )
हरि बिन क्यों जिऊँ री माइ
हरि कारण बौरी भई ज्यूँ काठहि घुन खाइ
औषद मूल संचरै, मोहि लाग्यो बौराइ
कमठ दादुर बसत जलमह, जलहि से उपजाइ
पल एक जल कौ मीन बिसरै तरपत मर जाइ
हरि ढ़ूँढ़ण गई बन-बन कहुँ मुरली धुन पाइ
मीरा के प्रभु लाल गिरधर, मिलि गये सुखदाइ
( III )
 जावो हरि निरमोहिड़ा, जाणी थाँरी प्रीत
लगन लगी जब प्रीत और ही, अब कुछ अवली रीत
अम्रित प्याय कै बिष क्यूँ दीजै, कूण गाँव की रीत
मीरा कहै प्रभु गिरधनागर, आप गरज के मीत



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